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कनुप्रिया (मंजरी परिणय – आम्र-बौर का गीत) (via Hindi Poetry Collection)

August 20, 2011

Wish I were a poet and could express thus my thoughts!

यह जो मैं कभी-कभी चरम साक्षात्कार के क्षणों मेंबिलकुल जड़ और निस्पंद हो जाती हूँइस का मर्म तुम समझते क्यों नहीं साँवरे!तुम्हारी जन्म-जन्मांतर की रहस्यमयी लीला कीएकान्त-संगिनी मैंइन क्षणों में अकस्मात्तुम से पृथक् नहीं हो जाती मेरे प्राण,तुम यह क्यों नहीं समझ पाते कि लाजसिर्फ जिस्म की नहीं होतीमन की भी होती हैएक मधुर भयएक अनजाना संशय,एक आग्रह भरा गोपन,एक निर्व्याख्या वेदना; उदासी,जो मुझे बार-बार चरम सुख के क्षणों में भीअभिभूत कर लेती है।भय, संशय, … Read More

via Hindi Poetry Collection

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